ek thi nadi

  

वह नीली नदी, 
अब नहीं मिलती,
उसे बेपानी हुए अर्सा हो गया,
उसकी चाहत में दबे पाँव,
रात में निकल पडता हूँ,
अंधेरा और पानी दोनों,
एक जैसे ही दिखते हैं,
जैसे नदी खामोशी ओढे‌,
चुप-चाप बैठी हो,
मैं उसका किनारा थामे,
वहीं उसके पास,
ठहर जाता हूँ..
नदी का अनंत विस्तार,
महसूस करने लग जाता हूँ,
अंधेरा जिंदगी का एक आयाम है
जो रोशनी में छुप जाता है
उसको देखना हो तो
अंधेरे में उतरना पड़ता है
नदी को मौन में बहते हुए सुनना,
एक अनोखी अनुभूति है,
यह अंधेरा,
जब गहरा होता चला जाता है,
तब नीली नदी,
सिर्फ़ धरती की नहीं रहती,
वह पूरे आकाश की हो जाती है,
वह बंद आँखों में
कुछ इस तरह बस जाती है,
हर तरफ नदी,
नजर आती है,
खोई हुई नदी पाने का,
यह तरीका अच्छा है,
नदी के किनारे,
कुछ देर बैठकर,
बंद आँखों से,
उसे देखा जाए,
©️rajhansraju 
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यह पोस्ट
के सौजन्य से है 

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